Sunday, June 1, 2025

 हे नरजीव!


हे नरजीव!

क्यों करता है पशुता पर तू आरोप?

कहता है तू क्यों उन्हें नीच?

मानो वे हों कोई बोझ?


मंदिर-मस्जिद के नामों पर,

तुम आपस में रखते हो बैर।

इससे भले हैं ये निर्बल पशु ही,

जो नहीं रखते मलाल कभी।


शोषण, अत्याचार, कपट और लोभ की

माया नगरी तुम रचते हो।

प्रेम-प्रीति के कानन की

करते हैं ये पशुजन सृष्टि।


कल्पना की इस मृगतृष्णा में,

यथार्थ को तुम बैठे हो भूल।

जीवन की यंत्रणाओं को सहकर,

शांति से रहते हैं ये सभी।


आज के इस यांत्रिक युग में,

जब सब बस अपनी ही सुनते हैं,

स्वार्थ की प्रेरणा में डूबकर,

अपना अस्तित्व तक खो देते हो।


इन बेजुबानों ने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा,

जो तुम इनके ऊपर करते हो वार?

नीच और पतित कहकर,

तुम करते हो इनका अपमान।


अपने खोए अस्तित्व को,

तुम ढूँढ न यूं दर-ब-दर।

इनके संग तुम भी जुड़ जाओ,

रहोगे खुश हर पल।


— यमुना सुधीर

Sunday, January 31, 2021

My Passion - My Poetry

 


गुलदस्ता

हम फूल हैं उस गुलदस्ते के,

जिसकी है हिमालय  शान ।

गंगा यमुना के निर्मल जल से,

पावन है यह देश महान।।१।।


हम फूल हैं उस गुलदस्ते के,

जिसमे अहिंसा की ध्वनि गूंजे ।

सत्य, प्रेम व भाईचारे का,

 संगम है यह पावन स्थान ।।२।।


हम फूल हैं उस गुलदस्ते के,

जिसकी चारो  दिशाएँ  करे सम्मान ।

जिसकी शीतल छाया में,

सब लोग करे इसकी गुणगान ।।३ ।।


हम फूल हैं उस गुलदस्ते के,

जिसमे  ज्ञान  का है अपार भंडार 

वीरो की जनानी है यह,

अमरता की है असीम मिसाल ।।४।।


-       - यमुना सुधीर

 हे नरजीव! हे नरजीव! क्यों करता है पशुता पर तू आरोप? कहता है तू क्यों उन्हें नीच? मानो वे हों कोई बोझ? मंदिर-मस्जिद के नामों पर, तुम आपस में...